भारत में 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) लागू हो गई है, जिसने पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह ली है। इस नए कानून में BNS की धारा 117 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो “स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने” (Voluntarily Causing Grievous Hurt) के अपराध से संबंधित है। अगर आप जानना चाहते हैं कि Section 117 of BNS in Hindi क्या है, इसके तहत सजा क्या है, यह जमानती है या नहीं, और IPC की किस धारा की जगह आई है — तो यह लेख आपके लिए है।
Section 117 of BNS in Hindi: स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना
भारतीय न्याय संहिता 2023 का अध्याय VI “मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराधों” से जुड़ा है। इसी अध्याय में धारा 117 आती है। यह धारा पुरानी IPC की धारा 325 की जगह लेती है, लेकिन इसमें कई नए और सख्त प्रावधान जोड़े गए हैं।
धारा 117 की परिभाषा सरल भाषा में
धारा 117 BNS के अनुसार:
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति को चोट पहुंचाता है, और उसका इरादा गंभीर चोट पहुंचाने का था या उसे यह पता था कि उसके कार्य से गंभीर चोट हो सकती है — और वास्तव में वह गंभीर चोट होती भी है — तो इसे “स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना” कहा जाएगा।
सरल शब्दों में: अगर किसी ने जानते-बूझते दूसरे को बड़ी चोट दी, तो वह इस धारा के दायरे में आएगा।
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Section 117 of BNS in Hindi: स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना — पूरा विवरण
स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना | Bharatiya Nyaya Sanhita 2023
BNS की धारा 117 को चार उपधाराओं में विभाजित किया गया है। प्रत्येक उपधारा अलग-अलग परिस्थितियों और सजाओं को परिभाषित करती है।
उपधारा (1) — परिभाषा
धारा 117(1) BNS की परिभाषा:
“जो कोई स्वेच्छा से चोट पहुंचाता है, यदि वह चोट जो वह पहुंचाने का इरादा रखता है या जिसे वह पहुंचाने की संभावना जानता है गंभीर चोट है, और यदि वह चोट जो वह पहुंचाता है गंभीर चोट है, तो उसे ‘स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना’ कहा जाएगा।”
स्पष्टीकरण (Explanation): कोई व्यक्ति स्वेच्छा से गंभीर चोट तभी पहुंचाता है जब:
- उसने वास्तव में गंभीर चोट पहुंचाई हो, और
- उसका इरादा गंभीर चोट पहुंचाने का था या उसे पता था कि ऐसा हो सकता है।
उदाहरण (Illustration): ‘A’ यह जानते हुए कि उसके वार से ‘Z’ का चेहरा स्थायी रूप से बिगड़ सकता है, उसे मुक्का मारता है। ‘Z’ का चेहरा स्थायी रूप से नहीं बिगड़ता, लेकिन ‘Z’ को 15 दिनों तक गंभीर शारीरिक पीड़ा होती है। इस स्थिति में ‘A’ ने स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाई मानी जाएगी।
BNS धारा 116 के अनुसार गंभीर चोट की श्रेणियाँ
धारा 117 को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि “गंभीर चोट” (Grievous Hurt) क्या होती है। BNS की धारा 116 इसे परिभाषित करती है:
| क्र.सं. | गंभीर चोट का प्रकार |
| 1 | नपुंसकता (Emasculation) |
| 2 | किसी आँख की स्थायी दृष्टि हानि |
| 3 | किसी कान की स्थायी सुनने की क्षमता का नुकसान |
| 4 | किसी जोड़ या हड्डी का भंग होना |
| 5 | किसी अंग या जोड़ का विकृत होना, नष्ट होना या उपयोगहीन हो जाना |
| 6 | सिर या चेहरे का स्थायी विरूपण (Disfiguration) |
| 7 | रीढ़ की हड्डी का फ्रैक्चर या अव्यवस्थित होना |
| 8 | 20 दिन से अधिक समय तक गंभीर शारीरिक पीड़ा या स्वस्थ जीवन जीने में अक्षमता |
उपधारा (2) — सामान्य सजा
BNS धारा 117(2) के तहत सजा:
जो कोई भी (धारा 122 की उपधारा 2 में दिए गए मामलों को छोड़कर) स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाता है, उसे निम्न सजा हो सकती है:
- अधिकतम 7 वर्ष का कारावास (कठोर या साधारण), और
- जुर्माना
जमानत की स्थिति: यह एक गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध है।
उपधारा (3) — स्थायी विकलांगता या स्थायी वनस्पति अवस्था
BNS धारा 117(3) — यह एक नया और कड़ा प्रावधान है जो IPC में नहीं था:
यदि किसी व्यक्ति को पहुंचाई गई गंभीर चोट के कारण:
- उसे स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) हो जाए, या
- वह स्थायी वनस्पति अवस्था (Persistent Vegetative State) में चला जाए,
तो उस अपराधी को न्यूनतम 10 वर्ष से आजीवन कारावास तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
उपधारा (4) — समूह द्वारा गंभीर चोट (Group Offence)
BNS धारा 117(4) एक और नई व्यवस्था है। यह उन मामलों पर लागू होती है जहाँ:
- पाँच या अधिक व्यक्तियों के समूह ने मिलकर किसी को गंभीर चोट पहुंचाई हो, और
- यह कार्य जाति, नस्ल, समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य आधार पर किया गया हो।
ऐसे मामले में समूह का प्रत्येक सदस्य अपराधी माना जाएगा, और सजा होगी:
- न्यूनतम 7 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और
- जुर्माना
यह प्रावधान घृणा-आधारित हिंसा (Hate Crime) को सीधे संबोधित करता है।
धारा 117 BNS के आवश्यक तत्व (Essential Elements)
धारा 117 के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए निम्नलिखित तत्वों का साबित होना जरूरी है:
- स्वेच्छा (Voluntariness): अपराध जानबूझकर और अपनी इच्छा से किया गया हो।
- आशय या ज्ञान (Intention or Knowledge): आरोपी का इरादा गंभीर चोट पहुंचाने का था, या उसे पता था कि ऐसा हो सकता है।
- वास्तविक गंभीर चोट (Actual Grievous Hurt): पीड़ित को वास्तव में गंभीर चोट आई हो।
- कारण और प्रभाव (Causation): आरोपी के कार्य और पीड़ित की चोट के बीच सीधा संबंध हो।
धारा 117 BNS और IPC धारा 325 में तुलना
| पहलू | IPC धारा 325 | BNS धारा 117 |
| विषय | स्वेच्छा से गंभीर चोट | स्वेच्छा से गंभीर चोट |
| सामान्य सजा | 7 साल तक + जुर्माना | 7 साल तक + जुर्माना |
| स्थायी विकलांगता पर | कोई विशेष प्रावधान नहीं | न्यूनतम 10 साल से आजीवन |
| समूह अपराध | स्पष्ट प्रावधान नहीं | 5+ लोगों पर अलग कड़ी सजा |
| घृणा-आधारित हिंसा | कवर नहीं | स्पष्ट रूप से शामिल |
| जमानत | गैर-जमानती | गैर-जमानती |
धारा 117 BNS में अपराध की प्रकृति (Nature of Offence)
| विशेषता | विवरण |
| अपराध का प्रकार | संज्ञेय (Cognizable) |
| जमानत | गैर-जमानती (Non-Bailable) — धारा 117(2) व (3) |
| विचारण (Trial) | सेशन न्यायालय |
| समझौता योग्य | नहीं (Non-Compoundable) |
धारा 117 BNS के तहत कौन से कार्य आते हैं?
निम्नलिखित कार्य इस धारा के अंतर्गत अपराध माने जा सकते हैं:
- किसी को जानबूझकर मारकर उसकी हड्डी तोड़ना
- किसी के चेहरे पर तेजाब फेंककर स्थायी विरूपण करना
- जानबूझकर किसी अंग को काटना या नुकसान पहुंचाना
- गला घोंटकर स्थायी क्षति पहुंचाने की कोशिश करना
- समूह में मिलकर जाति या धर्म के आधार पर किसी को गंभीर रूप से घायल करना
कानूनी प्रक्रिया: FIR से सजा तक
यदि कोई धारा 117 BNS के तहत शिकायत दर्ज कराना चाहता है, तो प्रक्रिया इस प्रकार है:
- FIR दर्ज करें: नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज कराएं।
- मेडिकल रिपोर्ट: डॉक्टर से चोट की पुष्टि करने वाली रिपोर्ट लें — यह कोर्ट में मुख्य साक्ष्य होती है।
- जाँच: पुलिस घटना की जाँच करेगी और साक्ष्य एकत्र करेगी।
- चार्जशीट: जाँच के बाद न्यायालय में चार्जशीट दायर की जाएगी।
- विचारण (Trial): मामले की सुनवाई सेशन न्यायालय में होगी।
- सजा: दोष सिद्ध होने पर न्यायालय सजा सुनाएगा।
Conclusion
BNS की धारा 117 भारतीय न्याय संहिता 2023 का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह न केवल स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने को परिभाषित करती है, बल्कि IPC की तुलना में कहीं अधिक कठोर और व्यापक सजाओं का प्रावधान करती है।
इस धारा की प्रमुख विशेषताएं हैं — स्थायी विकलांगता के मामले में न्यूनतम 10 साल की सजा, समूह-आधारित घृणा अपराधों के लिए अलग और कड़ी सजा, और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया। ये सभी बदलाव भारत की न्याय प्रणाली को आधुनिक और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं।
यदि आप या आपका कोई परिचित इस धारा से जुड़ी किसी स्थिति में है, तो किसी योग्य वकील से कानूनी सलाह लेना अत्यंत जरूरी है। कानून की सही जानकारी ही आपका सबसे बड़ा हथियार है।