137 2 bns in hindi

धारा 137(2) BNS in Hindi | अपहरण (Kidnapping) की सजा | BNS 137(2) क्या है? IPC 363 तुलना, उदाहरण

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Written by Admin

August 4, 2026

भारत में हर साल हजारों परिवार अपहरण जैसी घटनाओं से गुजरते हैं, और ज्यादातर लोगों को यह भी नहीं पता होता कि कानून उनकी मदद के लिए क्या कहता है। 1 जुलाई 2024 से पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 लागू हो चुकी है, और अपहरण से जुड़ा पुराना कानून यानी IPC धारा 363 अब धारा 137(2) BNS के नाम से जाना जाता है।

अगर आपका बच्चा गुम हो गया है, कोई नाबालिग बहला-फुसलाकर ले जाया गया है, या आप पर खुद अपहरण का आरोप लगा है, तो यह जानना बेहद जरूरी है कि धारा 137(2) BNS असल में कहती क्या है, इसकी सजा कितनी है, और कानूनी प्रक्रिया कैसे शुरू होती है। इस लेख में हम सरल हिंदी में हर पहलू को विस्तार से समझेंगे, ताकि आप या आपका कोई परिचित सही समय पर सही कदम उठा सके।

धारा 137 BNS क्या कहती है? (सरल व्याख्या)

धारा 137 BNS क्या कहती है? (सरल व्याख्या)

भारतीय न्याय संहिता की धारा 137 अपहरण को परिभाषित करती है, और इसे दो हिस्सों में बांटा गया है।

धारा 137(1) अपहरण के दो प्रकार बताती है:

  1. भारत से अपहरण (Kidnapping from India): जब किसी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना भारत की सीमा से बाहर ले जाया जाए।
  2. वैध अभिरक्षा से अपहरण (Kidnapping from Lawful Guardianship): जब किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम उम्र के लड़के या लड़की) या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को उसके अभिभावक की अनुमति के बिना उसकी वैध देखरेख से हटाया जाए, चाहे बच्चा खुद जाना चाहे या नहीं।

धारा 137(2) इस अपराध की सजा तय करती है। सीधे शब्दों में कहें तो जो व्यक्ति भारत से या वैध अभिरक्षा से किसी को अपहरण करता है, उसे कानून के तहत सख्त सजा का सामना करना पड़ता है।

यह प्रावधान भारतीय न्याय संहिता के अध्याय VI में आता है, जो “मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराधों” से जुड़ा है। इसका मकसद बच्चों, नाबालिगों और मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को शोषण, तस्करी और अवैध रूप से ले जाए जाने से बचाना है।

एक जरूरी बात यह भी है कि यह धारा उस व्यक्ति पर लागू नहीं होती जो सद्भावपूर्वक (good faith) यह मानता है कि वह किसी नाजायज बच्चे का पिता है, या जिसे कानूनी रूप से बच्चे की अभिरक्षा का अधिकार दिया गया हो। यानी असली पारिवारिक विवाद और आपराधिक अपहरण के बीच फर्क साफ रखा गया है।

IPC 363 vs BNS 137(2): तुलना तालिका

IPC 363 vs BNS 137(2): तुलना तालिका

नया कानून लागू होने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि पुराने और नए प्रावधान में क्या फर्क आया। नीचे दी गई तालिका दोनों की तुलना दिखाती है।

बिंदुIPC धारा 363BNS धारा 137(2)
कानूनभारतीय दंड संहिता, 1860भारतीय न्याय संहिता, 2023
लागू होने की तारीख1860 से 30 जून 2024 तक1 जुलाई 2024 से लागू
अधिकतम सजा7 वर्ष कारावास + जुर्माना7 वर्ष कारावास + जुर्माना
अपराध की प्रकृतिसंज्ञेय (Cognizable)संज्ञेय (Cognizable)
जमानत का प्रावधानजमानती (Bailable)जमानती (Bailable)
समझौता (Compounding)असमझौता योग्यअसमझौता योग्य
ट्रायल कोर्टप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेटप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
परिभाषा का स्थानधारा 359 से 361 में परिभाषा, धारा 363 में सजाधारा 137(1) में परिभाषा, धारा 137(2) में सजा

जैसा कि तालिका से साफ है, BNS 137(2) ने सजा की मूल संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है, बल्कि पुराने कानून को नई संहिता में उसी सजा के साथ स्थानांतरित (transfer) किया गया है। असली बदलाव नंबरिंग और भाषा की स्पष्टता में हुआ है, सजा की गंभीरता में नहीं।

एक बात ध्यान देने वाली है कि कई कानूनी पोर्टल इस अपराध की bailability को लेकर अलग-अलग जानकारी देते हैं। ज्यादातर आधिकारिक स्रोतों और लॉ पोर्टलों के अनुसार यह अपराध bailable है, ठीक वैसे ही जैसे पुरानी धारा 363 थी। फिर भी अगर मामले में अन्य गंभीर धाराएं (जैसे फिरौती या तस्करी से जुड़ी धाराएं) जोड़ी जाती हैं, तो जमानत की स्थिति बदल सकती है। इसलिए हमेशा अपने केस के दस्तावेजों के आधार पर वकील से पुष्टि करें।

धारा 137(2) BNS के मुख्य तत्व

किसी भी मामले को धारा 137(2) के तहत साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को कुछ जरूरी तत्व (essential elements) कोर्ट में साबित करने होते हैं।

  1. ले जाना या बहलाना (Taking or Enticing): आरोपी ने पीड़ित को शारीरिक रूप से ले जाया हो, या बहला-फुसलाकर अपने साथ चलने के लिए राजी किया हो।
  2. वैध अभिरक्षा से हटाना: यह कृत्य पीड़ित को उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की देखरेख से बाहर ले जाकर किया गया हो।
  3. सहमति का अभाव: अभिभावक की सहमति के बिना यह काम हुआ हो। ध्यान रहे, नाबालिग की अपनी सहमति यहां मायने नहीं रखती।
  4. आयु या मानसिक स्थिति: पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र का हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति हो (वैध अभिरक्षा वाले मामलों में)।
  5. भारत से बाहर ले जाना: यदि मामला “भारत से अपहरण” का है, तो पीड़ित को बिना सहमति देश की सीमा से बाहर ले जाया गया हो।

इन सभी तत्वों की पुष्टि पुलिस जांच और गवाहों के बयान के आधार पर होती है। अगर इनमें से कोई भी तत्व साबित नहीं होता, तो आरोपी को इस धारा से राहत मिल सकती है।

वास्तविक उदाहरण

कानूनी प्रावधान को समझने का सबसे आसान तरीका उदाहरण हैं। नीचे कुछ व्यावहारिक स्थितियां दी गई हैं।

उदाहरण 1: राहुल एक 15 वर्षीय लड़की को झूठा प्रेम-विवाह का वादा करके उसके घर से दूसरे शहर ले जाता है, बिना उसके माता-पिता को बताए। भले ही लड़की खुद जाने के लिए राजी हो, यह वैध अभिरक्षा से अपहरण माना जाएगा और राहुल पर धारा 137(2) BNS लागू होगी।

उदाहरण 2: सुनीता अपने पति से अलग होने के बाद अपने 5 साल के बेटे को बिना कोर्ट की अनुमति और पति की जानकारी के दूसरे देश ले जाती है। यह भारत से अपहरण की श्रेणी में आ सकता है, हालांकि पारिवारिक विवाद के मामलों में कोर्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसला करती है।

उदाहरण 3: एक पड़ोसी 10 साल के बच्चे को चॉकलेट का लालच देकर अपने साथ ले जाता है, बिना माता-पिता को बताए। यह स्पष्ट रूप से वैध अभिरक्षा से अपहरण है, चाहे बाद में बच्चे को सुरक्षित लौटा दिया जाए।

उदाहरण 4: एक व्यक्ति ईमानदारी से यह मानता है कि वह अपने नाजायज बच्चे का पिता है और इसी विश्वास के तहत बच्चे को अपने साथ रखता है। ऐसी स्थिति में कानून की स्पष्टीकरण (Explanation) के अनुसार उसे इस धारा से छूट मिल सकती है, बशर्ते नीयत सही साबित हो।

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले

अपहरण से जुड़े कानून को समझने में अदालती फैसले बड़ी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि यही तय करते हैं कि किन परिस्थितियों में यह धारा लागू होगी।

  • चंद्रकला मेनन बनाम विपिन मेनन (AIRONLINE 1993 SC 535): इस मामले में एक अलग हो चुके दंपत्ति के बीच बच्चे की कस्टडी को लेकर विवाद हुआ। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक कस्टडी विवादों को हमेशा सीधे आपराधिक अपहरण नहीं माना जा सकता, बल्कि परिस्थितियों और नीयत को देखना जरूरी है।
  • एस. वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास (1965): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग खुद अपनी मर्जी से घर छोड़कर आरोपी के साथ जाती है, बिना किसी सक्रिय बहलावे या प्रलोभन के, तो “टेकिंग” (taking) का तत्व साबित नहीं होता। यानी हर मामले में सक्रिय भूमिका (active role) साबित करना जरूरी है।
  • थाबिता पॉल जैसे मामलों में कोर्ट ने बार-बार दोहराया है कि नाबालिग की सहमति कोई बचाव नहीं है, क्योंकि कानून मानता है कि नाबालिग स्वतंत्र रूप से वैध सहमति देने में सक्षम नहीं होता।

इन फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि हर मामले की परिस्थिति अलग होती है, और कोर्ट तथ्यों की बारीकी से जांच करके ही फैसला सुनाती है।

पीड़ित (अभिभावक) के लिए स्टेप-बाय-स्टेप सलाह

अगर आपका बच्चा या परिवार का कोई सदस्य अपहृत हो गया है, तो घबराने के बजाय इन कदमों को तुरंत अपनाएं।

  1. तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन जाएं और धारा 137 BNS के तहत FIR दर्ज कराएं। यह संज्ञेय अपराध है, इसलिए पुलिस बिना वारंट के तुरंत कार्रवाई करने के लिए बाध्य है।
  2. बच्चे या पीड़ित की हाल की फोटो, ऊंचाई, पहचान चिह्न और आखिरी बार देखे जाने की जगह की पूरी जानकारी पुलिस को दें।
  3. गवाहों के बयान और सबूत जल्द से जल्द इकट्ठा करें, जैसे सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड या मैसेज।
  4. चाइल्डलाइन हेल्पलाइन 1098 पर संपर्क करें, यह 24×7 उपलब्ध सेवा नाबालिगों से जुड़े मामलों में मदद करती है।
  5. किसी अनुभवी क्रिमिनल वकील से तुरंत संपर्क करें, ताकि FIR सही धाराओं में दर्ज हो और आगे की कानूनी प्रक्रिया सही दिशा में चले।
  6. सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया की मदद लें, इससे बच्चे की जल्दी पहचान होने की संभावना बढ़ जाती है।
  7. मामले की प्रगति पर नजर रखें और जांच अधिकारी से नियमित अपडेट लेते रहें।

आरोपी के लिए सलाह

अगर किसी पर धारा 137(2) BNS के तहत झूठा या गलतफहमी में आरोप लगा है, तो निम्न बातें ध्यान में रखें।

  1. तुरंत किसी योग्य क्रिमिनल वकील से सलाह लें, खुद से पुलिस या पीड़ित पक्ष से बात करने से बचें।
  2. जमानत के लिए जल्द आवेदन करें, चूंकि यह अपराध सामान्यतः जमानती श्रेणी में आता है, समय रहते सही प्रक्रिया अपनाने से राहत मिल सकती है।
  3. अपनी सद्भावना (good faith) साबित करने वाले सबूत इकट्ठा करें, जैसे संदेश, गवाह या दस्तावेज जो यह दिखाएं कि इरादा आपराधिक नहीं था।
  4. अगर मामला पारिवारिक कस्टडी विवाद से जुड़ा है, तो अदालत में कस्टडी से जुड़े दस्तावेज और पिछले आदेश प्रस्तुत करें।
  5. किसी भी सबूत से छेड़छाड़ न करें, इससे मामला और कमजोर हो सकता है।
  6. कोर्ट की सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहें, अनुपस्थिति से गिरफ्तारी वारंट जैसी स्थिति बन सकती है।

8 उपयोगी FAQs

1. धारा 137(2) BNS की सजा क्या है?

इसमें अधिकतम 7 वर्ष तक की कैद और जुर्माना, दोनों का प्रावधान है।

2. BNS 137(2) और IPC 363 में क्या अंतर है?

सजा और मूल प्रावधान लगभग समान हैं, केवल धारा संख्या और भाषा को नई संहिता में अपडेट किया गया है।

3. क्या यह अपराध जमानती है?

हां, यह आमतौर पर संज्ञेय और जमानती अपराध है, लेकिन अन्य गंभीर धाराएं जुड़ने पर स्थिति बदल सकती है।

4. नाबालिग की सहमति बचाव बन सकती है?

नहीं, कानून के अनुसार नाबालिग की सहमति मान्य नहीं होती, अभिभावक की सहमति ही जरूरी होती है।

5. FIR कैसे दर्ज कराएं?

नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर घटना की पूरी जानकारी और सबूत देकर तुरंत लिखित शिकायत दर्ज कराएं।

6. धारा 137(2) BNS कब लागू होती है?

जब किसी व्यक्ति को उसकी या उसके अभिभावक की सहमति के बिना भारत से या वैध अभिरक्षा से ले जाया जाए।

7. पीड़ित को क्या सबूत रखने चाहिए?

फोटो, गवाहों के बयान, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और आखिरी लोकेशन की पूरी जानकारी रखनी चाहिए।

8. क्या समझौता संभव है?

नहीं, यह असमझौता योग्य (non-compoundable) अपराध है, इसलिए इसे निजी समझौते से खत्म नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

धारा 137(2) BNS भारतीय न्याय संहिता का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो बच्चों, नाबालिगों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों को अवैध रूप से ले जाए जाने से बचाता है। यह पुरानी IPC धारा 363 का ही अद्यतन (updated) रूप है, जिसमें सजा की गंभीरता वही बनी हुई है, लेकिन कानून की भाषा और संरचना को स्पष्ट किया गया है।

अगर आप पीड़ित पक्ष हैं, तो देरी किए बिना FIR दर्ज कराना और सबूत सुरक्षित रखना सबसे जरूरी कदम है। वहीं अगर किसी पर गलत आरोप लगा है, तो सही कानूनी सलाह और सद्भावना के सबूत मामले को सही दिशा देने में मदद करते हैं। हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है, इसलिए किसी भी निर्णय से पहले एक अनुभवी क्रिमिनल वकील से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प है।

अस्वीकरण: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है और यह किसी विशेषज्ञ वकील की व्यक्तिगत सलाह का विकल्प नहीं है। अपने विशिष्ट मामले के लिए हमेशा योग्य कानूनी सलाहकार से संपर्क करें।

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