परिचय: BNS Section 61(2) – आपराधिक षड्यंत्र का नया कानून
ज़्यादातर बड़े अपराध किसी एक व्यक्ति की करतूत नहीं होते। दो या उससे ज़्यादा लोग पहले योजना बनाते हैं, फिर उसे अंजाम तक ले जाते हैं। भारतीय कानून में इस “योजना बनाने” वाले हिस्से को ही आपराधिक षड्यंत्र यानी Criminal Conspiracy कहा जाता है।
1 जुलाई 2024 से भारत में नया आपराधिक कानून लागू हुआ है। पुरानी Indian Penal Code (IPC) की जगह अब Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) 2023 काम कर रही है। इसी बदलाव के तहत आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ा पुराना कानून, यानी IPC की धारा 120A और 120B, अब एक साथ मिलाकर BNS की धारा 61 में समाहित कर दिया गया है।
धारा 61 के दो हिस्से हैं:
- धारा 61(1) आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा बताती है
- धारा 61(2) उसकी सजा तय करती है
इस लेख में हम BNS Section 61(2) को आसान भाषा में समझेंगे, इसकी सजा, जमानत के नियम, IPC 120B से तुलना, असली जिंदगी के उदाहरण और अगर यह धारा किसी पर लग जाए तो क्या करना चाहिए, यह सब विस्तार से जानेंगे।
BNS Section 61(2) की पूरी व्याख्या

धारा 61(1): आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा पहले समझें
सजा को समझने से पहले परिभाषा जानना ज़रूरी है। धारा 61(1) के अनुसार जब दो या उससे ज़्यादा व्यक्ति किसी गैरकानूनी काम को करने या करवाने के लिए, या किसी ऐसे काम को गैरकानूनी तरीकों से करने के लिए आपस में सहमत होते हैं, तो इस सहमति को आपराधिक षड्यंत्र कहा जाता है।
इसमें एक शर्त भी जुड़ी है। अगर सहमति सिर्फ किसी अपराध को करने की नहीं, बल्कि किसी अन्य गैरकानूनी काम की है, तो तब तक यह षड्यंत्र नहीं माना जाएगा जब तक कि सहमति के अलावा किसी पक्षकार ने उस दिशा में कोई ठोस कदम यानी overt act न उठाया हो।
सीधी भाषा में कहें तो सिर्फ अपराध की सहमति देना ही काफी है, अपराध को असल में अंजाम देना ज़रूरी नहीं। यही बात इस धारा को बाकी कानूनों से अलग और गंभीर बनाती है।
धारा 61(2): सजा का प्रावधान
धारा 61(2) सजा को दो हिस्सों में बांटती है, जिन्हें उपखंड (a) और (b) कहा जाता है।
उपखंड (a): गंभीर अपराधों के लिए
अगर षड्यंत्र किसी ऐसे अपराध को करने का है जिसकी सजा मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या दो साल या उससे ज़्यादा की कठोर कैद है, और अगर BNS में इस षड्यंत्र के लिए कोई अलग सजा का प्रावधान नहीं दिया गया है, तो अपराधी को उतनी ही सजा मिलेगी जितनी उसे उस अपराध में उकसाने (abetment) के लिए मिलती।
यानी अगर किसी हत्या की साजिश रची गई है, तो साजिश में शामिल हर व्यक्ति को वही सजा भुगतनी पड़ सकती है जो हत्या के उकसाने वाले को मिलती है, भले ही उसने खुद हत्या न की हो।
उपखंड (b): अन्य मामलों के लिए
अगर षड्यंत्र किसी कम गंभीर अपराध से जुड़ा है, यानी उपखंड (a) में नहीं आता, तो सजा अधिकतम छह महीने तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों हो सकती है।
धारा 61(2) के मुख्य तत्व (Essential Ingredients)

अदालत में इस धारा के तहत दोष सिद्ध करने के लिए आमतौर पर निम्न बातें साबित करनी होती हैं:
- दो या उससे ज़्यादा व्यक्तियों के बीच सहमति होनी चाहिए
- यह सहमति किसी गैरकानूनी काम को करने, या किसी वैध काम को गैरकानूनी तरीके से करने की होनी चाहिए
- सिर्फ मानसिक सहमति ही काफी है, अपराध पूरा होना ज़रूरी नहीं
- गैर-आपराधिक गैरकानूनी काम के मामलों में सहमति के अलावा कोई ओवर एक्ट भी साबित करना पड़ सकता है
- साजिश साबित करने के लिए अक्सर परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जैसे कॉल रिकॉर्ड, चैट या पैसों के लेनदेन का सहारा लिया जाता है, क्योंकि साजिश की बैठकों का सीधा गवाह मिलना दुर्लभ होता है
IPC 120B vs BNS Section 61(2) की तुलना
बहुत से लोग सोचते हैं कि नया कानून पूरी तरह बदल गया है, लेकिन हकीकत यह है कि आपराधिक षड्यंत्र की मूल अवधारणा और सजा लगभग वैसी ही रखी गई है। असली बदलाव संरचना और भाषा में हुआ है।
| पहलू | IPC (पुराना कानून) | BNS Section 61(2) (नया कानून) |
| धाराओं की संख्या | परिभाषा धारा 120A में, सजा धारा 120B में अलग-अलग | परिभाषा और सजा दोनों एक ही धारा 61 में, उपधारा (1) और (2) में |
| सजा का ढांचा | गंभीर और मामूली अपराध के लिए अलग सजा तय थी | वही ढांचा बरकरार, उपखंड (a) और (b) में विभाजित |
| प्रभावी तारीख | 30 जून 2024 तक के अपराधों पर लागू | 1 जुलाई 2024 या उसके बाद के अपराधों पर लागू |
| भाषा शैली | पुरानी औपनिवेशिक भाषा शैली | सरल और आधुनिक भाषा शैली |
| गंभीर अपराध की सजा | उकसाने के बराबर सजा | कोई बदलाव नहीं, वही प्रावधान बरकरार |
| मामूली अपराध की सजा | अधिकतम छह महीने कैद या जुर्माना | कोई बदलाव नहीं |
| डिजिटल साक्ष्य | परंपरागत गवाही पर ज़्यादा निर्भरता | व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका अब ज़्यादा अहम |
एक ज़रूरी बात यह भी समझनी चाहिए कि BNS पूर्वव्यापी यानी prospective कानून है। अगर कोई घटना 30 जून 2024 या उससे पहले हुई है, तो उस पर आज भी IPC की धारा 120A और 120B ही लागू होंगी। सिर्फ 1 जुलाई 2024 के बाद हुई साजिश पर धारा 61 लागू होती है।
BNS 61(2) के रोज़मर्रा के उदाहरण

कानूनी भाषा को समझना आसान नहीं होता, इसलिए कुछ आम उदाहरणों से इसे समझते हैं।
उदाहरण 1: चोरी की योजना
तीन दोस्त मिलकर तय करते हैं कि पड़ोसी के घर से रात में सामान चुराएंगे। योजना बनाने के बाद वे घर के पास पहुंचकर खिड़की तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन घर का मालिक जाग जाता है और शोर मचा देता है। पुलिस आकर तीनों को पकड़ लेती है। यहां चोरी पूरी नहीं हुई, फिर भी तीनों पर धारा 61 के तहत आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज हो सकता है, क्योंकि साजिश के साथ-साथ ओवर एक्ट भी हो चुका था।
उदाहरण 2: ऑनलाइन धोखाधड़ी
कुछ लोग मिलकर फर्जी निवेश स्कीम के ज़रिए लोगों से पैसे ऐंठने की योजना बनाते हैं। व्हाट्सएप ग्रुप पर योजना डिस्कस होती है और बैंक खातों का इंतजाम किया जाता है। भले ही कुछ आरोपियों ने सीधे किसी से पैसे न लिए हों, फिर भी साजिश में शामिल होने की वजह से उन पर भी धारा 61(2) लग सकती है।
उदाहरण 3: गंभीर अपराध की साजिश
अगर कोई गिरोह हत्या या आतंकी गतिविधि की योजना बनाता पकड़ा जाता है, तो यह उपखंड (a) के तहत आता है। इसमें सजा उतनी ही गंभीर हो सकती है जितनी हत्या में उकसाने वाले को मिलती।
उदाहरण 4: कार्यालय में मामूली साजिश
अगर दफ्तर में दो कर्मचारी मिलकर किसी सहकर्मी को परेशान करने या उसकी छोटी सी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की योजना बनाते हैं, और वह अपराध मामूली श्रेणी का है, तो यह उपखंड (b) के तहत आएगा, जिसमें सजा ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने कैद या जुर्माना हो सकती है।
इन उदाहरणों से साफ है कि इस धारा में असली अपराध होना ज़रूरी नहीं, सिर्फ इरादे और सहमति की सच्चाई साबित होनी चाहिए।
अगर तुम पर BNS 61(2) लग गई हो तो क्या करोगे?

अगर किसी पर यह धारा लग जाए तो घबराने की बजाय सोच-समझकर कदम उठाना ज़रूरी है।
- तुरंत वकील से संपर्क करें आपराधिक षड्यंत्र के मामलों में साक्ष्य अक्सर परिस्थितिजन्य होते हैं, इसलिए शुरुआत से ही अनुभवी क्रिमिनल लॉयर की मदद लेना बेहद ज़रूरी है।
- FIR और चार्जशीट को ध्यान से पढ़ें यह समझना ज़रूरी है कि साजिश किस मुख्य अपराध (object offence) से जुड़ी बताई गई है, क्योंकि इसी पर सजा और जमानत दोनों निर्भर करते हैं।
- जमानत की संभावना का आकलन करें धारा 61(2) की जमानत योग्यता खुद तय नहीं होती, बल्कि जिस मुख्य अपराध की साजिश का आरोप है, उसी पर निर्भर करती है। अगर मुख्य अपराध जमानती है तो साजिश का मामला भी आमतौर पर जमानती माना जाता है। अगर मुख्य अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय है, जैसे हत्या या बड़ी धोखाधड़ी, तो साजिश का मामला भी गैर-जमानती माना जाता है।
- डिजिटल साक्ष्यों पर नज़र रखें आजकल ज़्यादातर साजिश के मामलों में कॉल डिटेल रिकॉर्ड, व्हाट्सएप चैट और बैंक लेनदेन को सबूत बनाया जाता है। अगर पुलिस डिजिटल डिवाइस ज़ब्त करती है, तो यह सुनिश्चित करें कि पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक और वीडियोग्राफी के साथ हुई हो।
- खुद कोई बयान देने से पहले सोचें पूछताछ के दौरान बिना वकील की सलाह के कोई बयान न दें। जल्दबाजी में दिया गया बयान बाद में मुश्किल खड़ी कर सकता है।
- सबूत इकट्ठा करें कि आप साजिश का हिस्सा नहीं थे अगर आप निर्दोष हैं, तो अपनी लोकेशन, कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और अन्य सबूत सुरक्षित रखें जो यह दिखा सकें कि आपने किसी सहमति में हिस्सा नहीं लिया।
- कोर्ट में अग्रिम जमानत का विकल्प भी देखें अगर गिरफ्तारी की आशंका है, तो परिस्थिति के अनुसार अग्रिम जमानत (anticipatory bail) के लिए आवेदन करने पर भी वकील से चर्चा करें।
Conclusion
BNS Section 61(2) भारत के नए आपराधिक कानून की एक अहम धारा है, जो पुरानी IPC की धारा 120A और 120B की जगह ले चुकी है। इस धारा की खासियत यह है कि यह सिर्फ पूरे हो चुके अपराध को नहीं, बल्कि अपराध की सोच और सहमति को भी सजा के दायरे में लाती है। इसीलिए इसे कानून की एक ऐसी धारा माना जाता है जो अपराध की जड़ पर ही वार करती है।
सजा का ढांचा मुख्य अपराध की गंभीरता पर निर्भर करता है, और जमानत भी उसी हिसाब से तय होती है। अगर किसी पर यह धारा लगती है, तो समय रहते सही कानूनी सलाह लेना और परिस्थितियों को ठीक से समझना सबसे ज़रूरी कदम है। कानून जटिल है, इसलिए किसी भी व्यक्तिगत मामले में हमेशा योग्य क्रिमिनल वकील से सलाह लेनी चाहिए।
FAQs
BNS Section 61(2) क्या है?
यह धारा आपराधिक षड्यंत्र यानी Criminal Conspiracy की सजा तय करती है। यह IPC की धारा 120B की जगह लागू हुई है।
क्या धारा 61(2) जमानती है या गैर-जमानती?
यह जिस मुख्य अपराध की साजिश पर आधारित है, उसी पर निर्भर करता है। गंभीर अपराध की साजिश गैर-जमानती और मामूली अपराध की साजिश जमानती मानी जाती है।
धारा 61(2) की अधिकतम सजा क्या है?
अगर साजिश गंभीर अपराध की है तो सजा उतनी ही हो सकती है जितनी उकसाने के लिए मिलती है। मामूली मामलों में अधिकतम छह महीने कैद या जुर्माना हो सकता है।
क्या बिना अपराध हुए भी सजा मिल सकती है?
हां, सिर्फ सहमति साबित होने पर ही सजा हो सकती है, अपराध पूरा होना ज़रूरी नहीं।
IPC 120B और BNS 61(2) में क्या फर्क है?
मूल अवधारणा और सजा लगभग वैसी ही है, बस परिभाषा और सजा को एक ही धारा में मिला दिया गया है और भाषा को सरल बनाया गया है।
क्या धारा 61(2) 1 जुलाई 2024 से पहले के मामलों पर लागू होती है?
नहीं, 30 जून 2024 तक के मामलों पर IPC की धारा 120A और 120B ही लागू होती हैं।
क्या व्हाट्सएप चैट को साजिश का सबूत माना जा सकता है?
हां, अगर सही प्रक्रिया और डिजिटल सर्टिफिकेट के साथ पेश की जाए, तो चैट और कॉल रिकॉर्ड अहम साक्ष्य बन सकते हैं।
अगर मुझ पर यह धारा लग जाए तो सबसे पहला कदम क्या होना चाहिए?
सबसे पहले किसी अनुभवी क्रिमिनल वकील से संपर्क करें और बिना सलाह के कोई बयान न दें।